7 - गलगता

दृश्य : 656

विवरण

यीशु के क्रूस पर चढ़ने का जो नाटक दुबारा मंचन किया गया है, उस को देखना कठिन पड़ता है | क्यों ईसाई लोग इस निर्दय घटना पर इतना जोर लगाते हैं? बहुत ऐसे लोग हैं जो यीशु को नेक आदमी, श्रेष्ठ भविष्यवत्ता स्मरण करना चाहते हैं, लेकिन इस का क्रूस पर चढ़ना कबूल नहीं करते हैं | यीशु को क्रूसारोपण देने का अस्वीकार यह भगवान का सर्व मानवजाति के प्रति दया का प्रत्यादेश करने बराबर है | यीशु के क्रूस पर मरने के साथ साथ हमारी पापों भरी प्रकृति भी इस क्रूस पर मर गयी है | भगवान ने कहा कि हमारी पापों भरी प्रकृति अच्छी चीज़ पैदा नहीं कर सकती है | वह गुनाह को अत्यंत बिगड़ी, व्यर्थ चीज़ समझता था और इस पर मौत का दण्ड लगाता है तथा इस को यीशु के साथ क्रूस पर चढ़ाता है | इस पीड़ाजनक कार्य के द्वारा जो क्रूस पर चढ़ना है भगवान इन आदमियों की पापों भरी प्रकृति को नष्ट करता है, जो पछतावा करते हैं और ईसा मसीह को अपना धर्म बनाते हैं | ईसा मसीह का छात्रा पौलुस रोमियों के ६:६ में लिखता है कि ईसाई लोग “उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया” | और आगे रोमियों के ६:११ में कहता हैं कि “ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।” | विश्व के लिए ऐसा यह विश्वास मूर्ख लगता है | फिर भी यह भयानक घटना ने विश्व के लिए सब से बड़ा ईश्वर का आशीष दिया और इस के द्वारा वही पहुंचाया गया है जो आदमी की बुद्धि नहीं पहुंचा पाया – अर्थात मानव जाति को पापों के बंधनों से मुक्ति |